करवा चौथ व्रत की कथा और पूजा करने की विधि | Karwa Chauth Vrat and Pooja Vidhi in Hindi





पुरे भारत में करवा चौथ के नाम की एक पर्व मनाया जाता है जिसे वैवाहिक स्त्रियाँ करती है| यह पर्व उत्तर-पूर्वी भारत में बहुत प्रशिद्ध है|  ये निर्जला एकादशी के सामान यह व्रत भी निर्जला ही किया जाता है| इस दिन सभी स्त्रियाँ अपने-अपने पतियों की दीर्घायु और शवस्त के लिए भगवान शिव और गौरी की आराधना करतीं है| यह व्रत कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चौथी तिथि को मनाया जाता है|

Karwa Chauth Vrat Katha

करवा चौथ का त्यौहार मूल रूप से पति-पत्नी के बीच पवित्र रिश्तों को और मजबूत करने का दिन होता है। इस दिन विवाहित स्त्रियां अपने पति की लम्बी उम्र और सुख समृद्धि के लिए निर्जला व्रत रखती हैं | संध्या में चन्द्रमा को अर्घ्य देकर और छलनी से अपनी पति को देखकर पति के हाथ से पानी पीकर व्रत खोलती है | पति अपनी पत्नियों को गिफ्ट भी देते है और इस दिन पति पत्नी अपने पवित्र रिश्ते को और  मजबूत बनाने के लिए एक दूसरे से साथ निभाने का वादा करते है |

करवा चौथ शुभ मुहूर्त-

करवा चौथ पूजा शुभ मुहूर्त : सायंकाल 6:37- रात्रि 8:00 तक चंद्रोदय- सायंकाल 7:55 चतुर्थी तिथि आरंभ- 18:37 (27 अक्टूबर) चतुर्थी तिथि समाप्त- 16:54 (28 अक्टूबर)

क्या आप जानते है करवा चौथ में चन्द्रमा को अर्ध्य क्यों दि जाती है?

करवा चौथ का व्रत कार्तिक मास की कृष्ण चतुर्थी को राखी जाती है। कार्तिक महीना हेमन्त ऋतु में परता है और इस समय आकाश बिलकुल साफ रहता है, जिसके कारन चन्द्रमा भी अछि तरह से दिख जाता है और इसके प्रकाश की लुत्फ़ भी उठाते है। चन्द्रमा मन का प्रतिनिधित्व करता है। स्त्रियों का मन अधिक चंचल होता है इसलिए मन को स्थिर और शक्तिशाली बनाने के लिए करवा चौथ के दिन चन्द्रमा को अर्घ्य देने की परम्परा है।

क्या आप जानते है की करवा चौथ के दिन पति को छलनी में क्यों देखा जाता है चाँद?

करवा चाैथ व्रत कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। इस व्रत में पुरे दिन निर्जला रहकर शाम के समय चंद्रमा को छलनी से देखकर व्रत खोला जाता है। ऐसी परम्परा है की इस व्रत में छलनी का महत्व इसलिए है, क्योंकि कथा के अनुसार छलनी के कारण ही एक पवित्र स्त्री का व्रत टूटा था। करवा चौथ की व्रत कथा के अनुसार भावुकता में आकर भाईयों ने अपनी बहन को छल से चांद की जगह छलनी की ओट से दीपक दिखाकर भोजन करवा दिया। झूठा चांद देखकर भोजन करने के कारण पवित्र स्त्री को अपना पति खोना पड़ा। इसके बाद पूरे भारत वर्ष में स्त्री ने चतुर्थी तिथि का व्रत रखा। पुनः करवा चौथ की व्रत के शाम में छलनी से वास्तविक चांद देखने के बाद पवित्र स्त्री को पति प्राप्त हुआ।



छलनी का एक मतलब छल करने वाला होता है। इसलिए महिलाये स्वयं अपने हाथ से छलनी लेकर चांद देखती है क्युकी कोई उन्हें झूठा चांद दिखाकर व्रत भंग न करा दे। करवा चौथ व्रत में छलनी लेकर चांद को देखना यह भी पता चलता है की है कि पतिव्रत का पालन करते हुए किसी प्रकार का छल उसे प्रतिव्रत से डिगा न सके।

करवा चौथ पर्व की पूजन सामग्री :

सिन्दूर, कुंकुम, मेंहदी, महावर, कंघा, चुनरी, चूड़ी, बिछुआ, बिंदी,चंदन, चावल, शहद, अगरबत्ती, पुष्प, कच्चा दूध, शक्कर, शुद्ध घी, दही, मिठाई, गंगाजल, मिट्टी का टोंटीदार करवा व ढक्कन,शक्कर का बूरा, हल्दी, दीपक, रुई, कपूर, गेहूँ, पानी का लोटा, गौरी बनाने के लिए पीली मिट्टी, लकड़ी का आसन, छलनी, हलुआ, आठ पूरियों की अठावरी और दान के रूप में बहुमूल्य वस्तुए साथ रखते है |

Karwa Chauth Puja

ये पूजा सामग्री को पूजा करने से पहले एकत्रित कर लें। करवा चौथ व्रत वाले दिन ब्रह्म मुहूर्त यानि बिल्कुक सुबह सूर्य निकलने से पहले जग कर स्नान कर नया कपडा धारण करे तथा शृंगार भी कर लें। इस अवसर पर करवा की पूजा-आराधना कर उसके साथ शिव-पार्वती की पूजा का भी पूजा करे कथा के अनुसार एक बार माता पार्वती ने कठिन तपस्या करके भगवन शिवजी को प्राप्त कर अखंड शौभाग्यावती का वरदान प्राप्त किया था। इसलिए करवा चौथ के दिन भगवान् शिव और माता पार्वती की विधि पूर्वक पूजा की जाती है। करवा चौथ व्रत के दिन चंद्रमा की पूजा का धार्मिक और ज्योतिष दोनों ही दृस्टि से महत्वपूर्ण है। करवा चौथ व्रत के दिन प्रात: स्नान आदि करने के पश्चात यह संकल्प कर  के करवा चौथ व्रत का सुभारम्भ करें।

करवा चौथ व्रत पूजन विधि :

सुबह जग कर नित्य क्रम कर स्नानं आदि कर ले और स्वच्छ कपडे पहन कर पूजा करे और संकल्प लेकर और व्रत सुभारम्भ करें।  व्रत के पुरे दिन निर्जला रहे और कुछ भी गलत काम न करे।  करवा चौथ व्रत का सुभारम्भ करें- सुबह पूजा के समय मन्त्र के जाप से व्रत प्रारंभ करे- “मम सुखसौभाग्य पुत्रपौत्रादि सुस्थिर श्री प्राप्तये करक चतुर्थी व्रतमहं करिष्ये” ।  घर के अंदर पूजा स्थल की दीवार पर चन्दन और गेरू से फलक बनाकर चावलों की पिशे आटे की घोल से करवा चित्रित करें। इस विधान को करवा धरना कहा जाता है। देर शाम के समय नजदीक मंदिर या अपने घर पे माता पार्वती की प्रतिमा को गोद में श्रीगणेश को विराजमान कर उन्हें लकड़ी के आसार पर बिठाए।




माता पार्वती जी की सुहाग सामग्री आदि से श्रृंगार करें और अर्पित करे।  भगवान शिव और माता पार्वती की दिल से आराधना करें और कोरे करवे में पानी भरकर पूजा करें। सौभाग्यवती स्त्रियां पूरे दिन का व्रत कर व्रत की कथा को पढ़े अथवा सुने | रात के समय, चंद्रमा के दर्शन करने के बाद ही अपने पति के हाथो अन्न एवं जल ग्रहण करें। पति, सास-ससुर सभी बड़े लोगो को प्रणाम कर आशीर्वाद ले तथा  व्रत को समाप्त करें।

Karwa Chauth Vrat Katha in Hindi : करवा चौथ व्रत कथा :

महिलाओं के अखंड सौभाग्य का प्रतीक करवा चौथ व्रत की कथा (Karwa Chautha Vrat Katha) कुछ इस प्रकार है- एक साहूकार के सात लड़के और एक लड़की थी। एक बार कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को सेठानी सहित उसकी सातों बहुएं और उसकी बेटी ने भी करवा चौथ का व्रत रखा। रात्रि के समय जब साहूकार के सभी लड़के भोजन करने बैठे तो उन्होंने अपनी बहन से भी भोजन कर लेने को कहा। इस पर बहन ने कहा- भाई, अभी चांद नहीं निकला है। चांद के निकलने पर उसे अर्घ्य देकर ही मैं आज भोजन करूंगी।

साहूकार के बेटे अपनी बहन से बहुत प्रेम करते थे, उन्हें अपनी बहन का भूख से व्याकुल चेहरा देख बेहद दुख हुआ। साहूकार के बेटे नगर के बाहर चले गए और वहां एक पेड़ पर चढ़ कर अग्नि जला दी। घर वापस आकर उन्होंने अपनी बहन से कहा- देखो बहन, चांद निकल आया है। अब तुम उन्हें अर्घ्य देकर भोजन ग्रहण करो। साहूकार की बेटी ने अपनी भाभियों से कहा- देखो, चांद निकल आया है, तुम लोग भी अर्घ्य देकर भोजन कर लो। ननद की बात सुनकर भाभियों ने कहा- बहन अभी चांद नहीं निकला है, तुम्हारे भाई धोखे से अग्नि जलाकर उसके प्रकाश को चांद के रूप में तुम्हें दिखा रहे हैं।




साहूकार की बेटी अपनी भाभियों की बात को अनसुनी करते हुए भाइयों द्वारा दिखाए गए चांद को अर्घ्य देकर भोजन कर लिया। इस प्रकार करवा चौथ का व्रत भंग करने के कारण विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश साहूकार की लड़की पर अप्रसन्न हो गए। गणेश जी की अप्रसन्नता के कारण उस लड़की का पति बीमार पड़ गया और घर में बचा हुआ सारा धन उसकी बीमारी में लग गया।

साहूकार की बेटी को जब अपने किए हुए दोषों का पता लगा तो उसे बहुत पश्चाताप हुआ। उसने गणेश जी से क्षमा प्रार्थना की और फिर से विधि-विधान पूर्वक चतुर्थी का व्रत शुरू कर दिया। उसने उपस्थित सभी लोगों का श्रद्धानुसार आदर किया और तदुपरांत उनसे आशीर्वाद ग्रहण किया।

इस प्रकार उस लड़की के श्रद्धा-भक्ति को देखकर एकदंत भगवान गणेश जी उसपर प्रसन्न हो गए और उसके पति को जीवनदान प्रदान किया। उसे सभी प्रकार के रोगों से मुक्त करके धन, संपत्ति और वैभव से युक्त कर दिया।




नारद पुराण के अनुसार इस दिन भगवान गणेश की पूजा करनी चाहिए। करवा चौथ की पूजा (Karwa Chauth Puja Vidhi) करने के लिए बालू या सफेद मिट्टी की एक वेदी बनाकर भगवान शिव- देवी पार्वती, स्वामी कार्तिकेय, चंद्रमा एवं गणेशजी को स्थापित कर उनकी विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए।

पूजा के बाद करवा चौथ की कथा सुननी चाहिए तथा चंद्रमा को अर्घ्य देकर छलनी से अपने पति को देखना चाहिए। पति के हाथों से ही पानी पीकर व्रत खोलना चाहिए। इस प्रकार व्रत को सोलह या बारह वर्षों तक करके उद्यापन कर देना चाहिए। पूजा की कुछ अन्य रस्मों में सास को बायना देना, मां गौरी को श्रृंगार का सामान अर्पित करना आदि शामिल है।